5 sad poetry in hindi

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1 – (जो मिला मुसाफ़िर)

जो मिला मुसाफ़िर वो रास्ते बदल डाले
दो क़दम पे थी मंज़िल फ़ासले बदल डाले

आसमाँ को छूने की कूवतें जो रखता था
आज है वो बिखरा सा हौंसले बदल डाले

शान से मैं चलता था कोई शाह कि तरह
आ गया हूँ दर दर पे क़ाफ़िले बदल डाले

फूल बनके वो हमको दे गया चुभन इतनी
काँटों से है दोस्ती अब आसरे बदल डाले

इश्क़ ही ख़ुदा है सुन के थी आरज़ू आई
ख़ूब तुम ख़ुदा निकले वाक़िये बदल डाले


2- (जब तु मिली मुझको)

जब तु मिली मुझको और मैने तुझे चाहा
तब मैं बदनसीब था और तु खुशनसीब थी
भरी महफिल मे जब तुने मुझको ठुकराया
तब मैं खुशनसीब था और तु बदनसीब थी
मै रोया था मगर आंसू न गिरे थे
मेरे हिस्से का मेरा वो तन्हा नसीब था
बड़े सलीके से तुने मुझे आईना दिखाया
मै बदतमीज था तु बुत-ए-तमीज थी
ख्वाब जो भी देखे सब बद ख्वाब थे
तेरे तारिफो मे पढे कसीदे मेरी बेहिजाबी थी
था मै इनफराद पहले हूँ मै इनफराद अब भी
बहुत कुछ था संग तेरे पर तु बद लिहाज थी
भले अधूरी थी मोहब्बत की जो भी तालीम थी
मना लेता फिर भी पर तेरी शर्ते अजीब थी
अब भी पूछ लेता हूं खैरियत इनायत के बहाने
न भुला सका तुझको क्योंकि तु मेरी अजीज थी


3- (सुकून-ए-ज़िंदगी)

रुई का गद्दा बेच कर.. मैंने इक दरी खरीद ली,
ख्वाहिशों को कुछ कम किया मैंने और ख़ुशी खरीद ली..
सबने ख़रीदा सोना..मैने इक सुई खरीद ली,
सपनो को बुनने जितनी डोरी ख़रीद ली..
मेरी एक खवाहिश मुझसे मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हंसी से मैंने अपनी कुछ और ख़ुशी खरीद ली..
इस ज़माने से सौदा कर.. एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और शामें खरीद ली..
शौक-ए-ज़िन्दगी कमतर से और कुछ कम किये,
फ़िर सस्ते में ही “सुकून-ए-ज़िंदगी” खरीद ली।


4- (मानना होगा)

मेरी कविता को पढकर
अगर तुम्हारी आंखें न सही
मन ही थोड़ा गीला हो जाए
तो तुम्हें मानना ही होगा
कि व्यावहारिकता का पाठ
सीखने में तुमसे
कुछ कसर रह गई।


5- (मुझको खुद होश नहीं है)

हम दोनों को खोने में
दोनों का दोष नहीं है
दोष किसी को दूँ भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है ।

बातें जो तब कही थीं तूने
अब तक मुझको याद हैं
अपने ख्वाबों पर बसा शहर
अब तक मन में आबाद है
तेरी बातें मन में मेरे
अब भी खामोश नही हैं
पर दोष किसी को दूं भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है ।

मुझसे भेद छुपाया था ,
पर खुद से तो बोला होता
जो बोझ दिया तूने मुझको
कभी उसको भी तौला होता
मन अब भी तेरी बातें सुनता
पर मदहोश नही है
दोष किसी को दूँ भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है ।

जब मैं साथ तेरे था
तुझसे खूब लड़ा करता था
क्योंकि दूर तेरे जाने से
मन मेरा बेहद डरता था
पर जब तूने ही सोच लिया तो
अब लड़ने का जोश नही है
दोष किसी को दूं भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है ।

मन बेहोश था शायद मेरा
जो सब तुझसे कह देता था
तू चाहे कितने झूठ कहे
पर मन तब सब सह लेता था
बातें तो अब भी करता हूँ
पर मन बेहोश नही है
दोष किसी को दूं भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है

मजबूरी तेरी भी होगी
जो मुझको शायद पता नही है
पर सबकुछ मैं ही क्यों झेलूं
जब मेरी कोई खता नही है
पता तो तेरे मन को भी है
के तू निर्दोष नही है |
पर दोष किसी को दूं भी कैसे
मुझको खुद होश नहीं है ।

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Asif Khan

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