अमर शहीद सुखदेव की जीवनी

प्रारम्भिक जीवन

सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम  के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्हें भगत सिंह और राजगुरु  के साथ 23  मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था। इनकी शहादत को आज भी सम्पूर्ण भारत  में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी का सपना पाले हुए थे। ये दोनों ‘लाहौर नेशनल कॉलेज’ के छात्र थे। दोनों एक ही सन में लायलपुर में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए।

अमर शहीद सुखदेव बचपन से ही क्रांतिकारी थे| वह हमेशा ऊँच-नीच की भावना से विरूद्ध रहते थे | यह प्रेरणा उन्हें ताऊ चिन्तराम थापड़ और आर्यसमाज से मिली थी| सन  1919 ई० में अमृतसर के जलियाँवाला कांड के कारण सम्पूर्ण देश में विद्रोह की आग भड़क गई थी| उन दिनों सुखदेव लायलपुर के सनातन धर्म विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे| पंजाब में जलियांवाला नरसंहार के विरूद्ध स्थान-स्थान पर हिंसक घटनाएँ घट रही थी | अंग्रेज़ सरकार ने मार्शल लॉ लागू कर दिया था जिसके कारण पंजाब के नगरों में हथियारबंद फौजी जवानो का राज़ था|

शैक्षिक जीवन

एक दिन विद्यालय की परेड का आयोजन था| प्राचार्य की तरफ से आदेश मिला की अंग्रेज़ अधिकारी को परेड में सलामी दें | सभी छात्रों ने सलामी दी परन्तु सुखदेव डटकर खड़े रहे | उन्होंने सलामी देने से स्पष्ट इंकार कर दिया| यह देखकर अँगरेज़ अधिकारी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया | उसने तड़ातड़ कई रूल उनपर जड़ दिए ;पर सुखदेव उसी तरह खड़े रहे| इससे विद्यालय में हड़कंप मच गया | सुखदेव ने गर्जना की ,”अब मै कल से काले कानूनों के रहते इस गुलाम स्कूल में पैर नहीं रखूंगा|”

इस प्रण को निभाते हुए जब सुखदेव युवा हुए,तो एक दिन माता रल्लो देवी ने कहा,”सुखदेव! अब मै तुम्हारी शादी करूंगी और तुम घोड़ी चढ़ोगे| इतना सुनते ही सुखदेव ने उत्तर दिया,”माँ तुम देखना ,मै घोड़ी पर नहीं ,फांसी के फंदे पर चढूँगा,देश की आज़ादी के लिए |”

क्रन्तिकारी जीवन

उन दिनों असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले राष्ट्रभक्त छात्रों को शिक्षण संस्थाओं से निष्काषित कर दिया जाता था | ऐसे राष्ट्रभक्त छात्रों के लिए लाला लाजपत राय ने लाहौर में ‘नेशनल कॉलेज ‘की स्थापना की थी ,जिसके प्राचार्य प्रख्यात स्वाधीनता सेनानी जुगल किशोर थे | उन्होंने क्रांतिवीर सावरकर के साथ काला पानी की सजा काटी थी| वहाँ से लौटने पर ही उन्हे नेशनल कॉलेज की बागडोर सौंपी गयी थी | भाई परमानंद उस कॉलेज में इतिहास का अध्यापन कराते थे | वे छात्रों को इतिहास पढ़ाते पढाते अंडमान जेल के रोमांचकारी किस्से भी सुनाया करते थे | सुखदेव और भगतसिंह भाई परमानंद जी के प्रति अनन्य श्रद्धा रखने लगे थे |

इस प्रकार नेशनल कॉलेज में अध्ययन करते हुए सुखदेव और भगतसिंह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहने लगे थे | लाहौर के सालमी दरवाज़ों के एक घर में सुखदेव अपने मित्र  रहा करते थे | वहाँ भगतसिंह और अन्य युवा साथियों का जमघट लगा रहता था | कभी -कभी यशपाल भी वहां आया करते थे |

‘नौजवान भारत सभा’ का गठन

सन 1926 में लाहौर में सुखदेव ,भगतसिंह और भगवतीचरण बोहरा ने “नौजवान भारत सभा “का गठन किया था| समय समय पर आयोजनों के माध्यम से युवकों को स्वतन्त्रता के आंदोलन से जुड़ने की प्रेरणा भी दी जाती थी| 16 नवंबर को अमर शहीद करतार सिंह सराबा का बलिदान दिवस ‘ब्रेडले हाल ‘में धूमधाम से मनाया गया,तो पुलिस और गुप्तचर विभाग का पसीना छूट गया | इस समारोह में आयोजकों का पीछा किया जाने लगा |

गोर पुलिस अधिकारी जे०पी० सांडर्स की हत्या से सम्पूर्ण देश में तहलका मच गया था | लाहौर में चप्पे चप्पे पर पुलिस छा गई थी| सुखदेव ने गुप्त अड्डे ‘मजंग होउस’ में रखे हथियारों की सुरक्षा संभाल रखी थी| उन्होंने चंद्रशेखर आजाद,भगत सिंह और राज गुरु आदि को लाहौर से सुरक्षित बहार निकलने की समस्या को भी सुलझाया था | उन्होंने जय गोपाल को माता रल्लो देवी के पास लायलपुर में यह कहलवाकर भेजा की मथुरा दास बीमार है |

15  अप्रैल सन 1929 को सुखदेव एक भेदिये के संकेत पर  बंदी बना लिए गए थे | कुछ भेदियों की संगठन में घुसपैठ पहले ही हो चुकी थी | ये गद्दार क्रांतिकारियों से मिलकर स्वम् को राष्ट्र भक्त सिद्ध करने का प्रयास करते थे ; किन्तु अंदर ही अंदर गुप्त सूचनाएं पुलिस तक पहुंचना उनका काम था | इन्ही  के माध्यम से गुप्त अड्डों और बम फैक्ट्रियो के सुराग पुलिस तक पहुंच पाए थे | इन्ही के कारण भगत सिंह, सुखदेव , राज गुरु आदि महान क्रांतिकारियों पर लाहौर की विशेष अदालत में मुकदमा चला |

निधन

अंग्रेज़ अधिकारियो ने सुख देव को सरकारी गवाह बनाने का  भरसक प्रयास किया पर उन्हें असफलता ही हाथ लगी सुख देव ने अपनी माँ को वचन दिया था की वह शादी की घोड़ी पर न चढ़कर देश की आज़ादी  के लिए फ़ासी के फंदे पर चढ़ेंगे ,फिर 23 मार्च 1931 को उन्होंने पूरा कर दिखाया | भगत सिंह और राज गुरु के साथ वह भी फ़ासी के फंदे पर चढ़कर अमर हो गए |

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Asif Khan

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