अरुणिमा सिन्हा की प्रेरणादायक कहानी

दोस्तों आज हम आपके लिए एक प्रेरणादायक कहानी लाये हैं ये कहानी है अरुणिमा सिन्हा की जिन्होंने अपनी ज़िंदगी से लड़कर अपने हौसले को कमज़ोर नहीं होने दिया और पूरी दुनिया में नारियों के लिए एक मिसाल बन गयी |

ये कहानी तब शुरू होती है जब अरुणिमा 2011 में एक ट्रेन में सफर कर रहीं थी | वह लखनऊ से दिल्ली आ रही थी,उन्होंने एक गोल्ड चैन पहनी हुई थी उस चैन को देख कर  बदमाशों ने उनसे उस चैन को छीनने की कोशिश की | पर अरुणिमा नेशनल लेवल पर वॉलीबॉल खेल चुकी हैं,तो उनको उन्होंने चैन नहीं छीनने दी | तब उन बदमाशों ने अरुणिमा सिन्हा को चलती ट्रैन से बहार फेंक दिया |

अरुणिमा जब चलती ट्रैन से बहार की ओर गिरी तब दूसरी  ट्रैन से टकराई और अपने पैरों को कटा हुआ पाया और फ्रैक्चर हो गया था | उनके स्पाइन में 3 फ्रैक्चर  हुए | वह चीखती रहीं और मदद की भीख मांगती रहीं पर किसी ने उनकी नहीं सुनी | वह पूरी रात उस पटरी पर रही और उस ट्रैन पर जो भी चूहे वगैरा थे वह उनके पैरों को कुतर रहे थे,वह कुछ कर सकती पर उनके पैर हाथ कुछ भी काम नहीं कर रहा था | बस उनका दिमाग ठीक था | उन्होंने हार नहीं मानी वह पूरी रात अपनी मौत से लड़ती रही |

“उनका कहना है,जहाँ चाह होती है !!!!वहां राह होती है | “

अगले दिन गांव वालों ने उनको देखा तब बरेली डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में उनको भर्ती करवाया | उन्हें कही ब्लड नहीं मिल रहा जिससे उनका ट्रीटमेंट शुरू हो सके | फिर वहां दो डॉक्टर्स थे उन्होंने 1-1 यूनिट अपना ब्लड देकर उनका ट्रीटमेंट शुरू किया | जब पता चला की वह नेशनल प्लेयर है तब उनको KGMC लखनऊ हॉस्पिटल में उनका ट्रीटमेंट हुआ फिर वहां से AIIMS हॉस्पिटल दिल्ली में उनको शिफ्ट किया गया और उनका अच्छा ट्रीटमेंट हुआ |

26 दिन बाद जब वह कुछ ठीक हो चुकी थी | उनको जब पता चला की लोग उनके बारे में अफवाहें उड़ा रहे हैं की ख़ुदकुशी कर रही थी,या बिना टिकट के ट्रेन में चढ़ गई थी | तब अरुणिमा ने सोचा की लोगों को कैसे जवाब दिया जाये,उन्होंने फिर  Mountaineering करने की सोची | उसके लिए उन्हें अच्छे मेंटर और अच्छे एक्सपर्ट की जरूरत है | उन्हें फिर मैडम बछेंद्री पाल का आईडिया है जिन्होंने १९८४ में एवेरेस्ट समिट किया था |  वे तुरंत हॉस्पिटल से निकलकर बछेंद्री पाल से मिली  |

जब मैडम बछेंद्री पाल ने अरुणिमा को देखा उनकी आँखों में आंसू आ गए | उन्होंने तुरंत अरुणिमा से  एक सवाल पुछा की ऐसे हालातों में तुम्हारे दिमाग में यह करने का हौसला कहाँ से आया ?

उन्होंने कहा की तुमने एवेरेस्ट जैसे पहाड़ के बारे में सोचा तो “तुमने अपने अंदर तो एवेरस्ट पता कर लिया बस दुनिया को दिखाना बाकी है |”

अरुणिमा को उन्होंने सिखाया ट्रेनिंग दी | एक पैर में रॉड और दूसरा पैर अर्टिफिशियल था पर फिर भी अरुणिमा डटी रही| 8 महीने तक उन्होंने धीरे धीरे सीखा |

इसके बाद अरुणिमा सिन्हा बछेंद्री पाल की निगरानी में लेह से नेपाल, लद्दाख में पर्वतारोहण के गुर सीखी फिर पूरी तरह से तैयार होने के बाद अरुणिमा सिन्हा ने एक नए इतिहास लिखने की तैयारी में 31 मार्च 2013 को मांउट एवेरेस्ट चढाई की शुरुआत कर दी और फिर 52 दिनों की दुश्वार चढ़ाई और ठंड से कपा देने वाली बर्फ को पार करते हुए एक नए उचाई की इबारत लिखते हुए अरुणिमा सिन्हा ने 21 मई 2013 को माउंट एवेरेस्ट फतह कर लिया और इतिहास में प्रथम विकलांग महिला एवेरस्ट फतह करने वाली महिला / Handicaped First Woman to Climb Mount Everst  बन गयी|

अरुणिमा सिन्हा का सपना है की वो वर्ल्ड के जितने भी highest peaks continents है उनपर अपना इंडिया का तिरंगा लहराए | उनमे से उन्होंने एशिया एवेरेस्ट,अफ्रीका किलिमंजरो,यूरोप एल्ब्रुस इन सब चोटियों को उचाईयों को उन्होंने पार कर लिया है और उन पर इंडिया का झंडा फेहरा दिया |

अरुणिमा सिन्हा  द्वारा कही गयी कविता

अभी तो इस बाज़ की असली उड़ान बाकी है ,

अभी तो इस परिंदे का इम्तिहान बाकी है | 

अभी अभी मैंने लांघा हैं समुन्द्रों को,

अभी तो  पूरा आसमान  बाकी है | |

अरुणिमा सिन्हा भी चाहती तो औरो की तरह अपनी कमजोरी को अपनी बेबसी और लाचारी मानकर चुपचाप बैठ जाती और जिंदगी में कभी आगे नही बढ़ पाती और पूरा जीवन दुसरो के सहारे गुजरना पड़ता लेकिन एवरेस्ट से भी ऊँचा हौसला रखने वाली अरुणिमा सिन्हा ने अपने जीवन में कभी हार नही मानी, मुश्किल हालात सबके जीवन में आते है लेकिन विजयी वही होता है जिनके इरादे बुलन्द होते है ऐसी सोच रखने वाली अरुणिमा सिन्हा जैसे ही लोग हमारे देश भारत की शान है जो हर मुश्किलो का सामना करते हुए विजयपथ की ओर बढ़ते जाते है और हम सभी के जीवन में अँधेरे में भी प्रकाश की आशा दिखाते है

उम्मीद है दोस्तों आपको ये प्रेरणादायक कहानी पसंद  आयी होगी,आप हमे comment के माध्यम से बता सकते हैं |

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Asif Khan

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