करनी का फल-Inspiring story

प्राचीन युग की बात है| गंगा नदी के तट पर मकंडिका नाम की नगरी थी| उस नगरी में एक मौनी सन्यास रहता था| वह भिक्षा मांगकर अपना और अपने शिष्यों का पेट पालता था| एक दिन वह भिक्षा मांगते हुए रामलाल व्यापारी के द्वार पर पहुँच गया| रामलाल नगर का अच्छा व्यापारी था| माकंडिका में उसकी अच्छी साख थी| उनका रहन-सहन और खान पान भी बहुत अच्छा था|

मौनी सन्यासी ने द्वार पर दस्तक दी| उस दिन रामलाल के नौकर चाकर किसी  काम में लगे हुए थे| पत्नी पूजा-पाठ में लगी थी| द्वार पर दस्तक सुनकर बोली,”सुलक्षणा,देख तो सही द्वार पर कौन है ?”

सुलक्षणा अति सुंदर युवती थी| उसने अपने जीवन के अठारह वसंत ही देखे थे| उसका एक एक अंग गदराया हुआ था| उसने द्वार खोलकर देखा और वहीं से चिल्लाकर बोली ,”माँ !मौनी बाबा !”| “उन्हें भिक्षा दे दो |” सुलक्षणा की माँ की आवाज़ आई|

सुलक्षणा कुछ देर बाद भिक्षा लेकर लौटी | जैसे ही वह भिक्षा सन्यासी की झोली में डालने लगी ,वैसे ही वह ज़ोर से चीख उठा,”घोर संकट आने वाला है |”इससे पूर्व सुलक्षणा ने इस सन्यांसी को बोलते नहीं देखा था| उसके मुख से घोर अनर्थ की बात सुनकर वह घबरा गई| वह द्वार बंद करके लौट आयी|

वह सन्यासी बड़बड़ाता हुआ अपने मठ की ओर चला गया | दोपहर को जब रामलाल घर पर भोजन करने के लिए आया,तो उसकी पत्नी ने सन्यासी की बात कह दी| उसे सुनकर रामलाल चिंता में पड़ गया| कुछ दिनों से उसका व्यापार ढीला चल रहा था| वह जिस सौदे में भी हाथ डालता,उसी में उसे लाभ के स्थान हानि हो रही थी| सन्यासी की बात उसके मन में बैठ गई| वह जल्दी से भोजन करके सन्यासी के मठ पर पहुंचा| उस समय मौनी सन्यासी अपने शिष्यों के साथ किसी विषय पर विचार-विमर्श कर रहा था| रामलाल को देखते ही उन्हें हटने के लिए कह दिया|

रामलाल ने पुछा,”महाराज! आप तो सदा मौन धारण किये रहते थे| आज इस तरह बोलने का क्या कारण है ?”सन्यासी मुस्कराता हुआ बोलै ,”वत्स !आज तुम्हारी लड़की को देखकर मुझसे बिना बोले रहा नहीं गया| उसका भाग्य मंद है | उसका विवाह होते समय तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा |”

इतना सुनकर रामलाल घबरा गया| उसका चेहरा पीला पद गया| उसने कम्पित स्वर में कहा ,”महाराज!इस सर्वनाश से मुझे बचा लो |” इसके लिए बेटी के मोह का त्याग करना होगा “सन्यासी कुछ सोचकर बोला |”पर महाराज! मै लुटने से तो बच  जाऊंगा?” रामलाल ने पूछा| “हां,अवश्य !”सन्यासी का उत्तर था|

“फिर जल्दी कहिये,मुझे क्या उपाए करना होगा ?”रामलाल ने उत्सुकता से कहा|

“तुम अपनी बेटी को लकड़ी के संदूक में बंद करके और उसके ऊपर जलता हुआ एक दीपक रखकर गंगा की धारा में छोड़ दो| “सन्यासी ने उपाय बताया|

इतना सुनकर रामलाल घर लौट आया| बेटी का प्यार भी सर्वनाश के आगे फीका पड़ गया था| उसने बाज़ार से एक लकड़ी का बड़ा संदूक खरीदा| रात्रि में उसमे सुलक्षणा को बिठाकर और उसके ऊपर जलता हुआ दीपक रखकर गंगा की धारा में छुड़वा दिया| उसका मन अंदर ही अंदर बेटी के लिए तड़प रहा था|

सन्यासी ने नगरी से काफी दूरी पर अपने शिष्यों को वह संदूक निकालने के लिए पहले से ही भेज रखा था| उससे पूर्व ही एक राजकुमार की दृष्टि उस संदूक पर पड़ गयी| उसने अपने सेवकों से उस संदूक को निकलवा लिया| खोलकर देखा तो उसमे अद्वितीय सुंदरी निकली| उसका पूर्ण परिचय पाकर राजकुमार उसे अपने साथ ले गया|  अपने सेवको को उसमे एक बंदरिया बंद करके संदूक को वैसे ही गंगा में छोड़ने के लिए कह गया|

राजकुमार के सेवकों ने वैसा ही किया| राजकुमार ने अपनी नगरी पहुंचकर सुलक्षणा के साथ विवाह कर लिया| उसने अपने कर्मचारी को माकंडिका भेजकर सुलक्षणा के पिता को विवाह की सूचना दे दी| रामलाल की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था | उधर जब संदूक बहता हुआ शिष्यों के सामने से गुजरा तो उन्होंने उसे निकाल लिया| उसे लेकर  के पास आये| वह सन्यासी उस संदूक को मंत्रसिद्ध करने का बहाना करके एकांत में ले गया |

सन्यासी के शशि संदूक को छोड़कर चले गए| उनके जाने के बाद जैसे ही सन्यासी ने संदूक खोला ,बंदरिया ने उछलकर उसके नाक-कान काट लिए| सवेरे सन्यासी की दशा देख कर शिष्यों ने उसका खूब मजाक उड़ाया| उसी समय वह मठ छोड़कर चला गया| मकंडिका के वासियों ने फिर कभी उस सन्यासी को नही देखा| उसे अपनी करनी का फल मिल गया था|

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Asif Khan

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